काकोरी कांड के 100 वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, अशफाक उल्ला खां के बलिदान को किया याद।
शाहजहांपुर से अंजू की रिपोर्ट।
शाहजहांपुर। काकोरी कांड के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में शाहजहांपुर हिंदी रंगमंच की ओर से शहीद-ए-आजम अशफाक उल्ला खां की मजार परिसर में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। “स्वतंत्रता आंदोलन में काकोरी कांड की ऐतिहासिक भूमिका, शहीद अशफाक उल्ला खां का योगदान और क्रांतिकारियों का संघर्ष” विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी रहे, जबकि प्रो. मोहम्मद नोमान ने मुख्य वक्ता के रूप में काकोरी कांड और उससे जुड़े क्रांतिकारी आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि काकोरी कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ऐसी महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की।
वक्ताओं ने बताया कि 9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने काकोरी के निकट सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को रोककर ब्रिटिश शासन की आर्थिक व्यवस्था को चुनौती दी थी। इस घटना में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह सहित कई क्रांतिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। काकोरी कांड के बाद अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों के खिलाफ व्यापक कार्रवाई की, लेकिन इससे स्वतंत्रता आंदोलन की भावना और मजबूत हुई।
मुख्य अतिथि सुधीर विद्यार्थी ने कहा कि शहीद अशफाक उल्ला खां का जीवन त्याग, साहस और राष्ट्रप्रेम की अद्भुत मिसाल है। उन्होंने कहा कि अशफाक उल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती हिंदू-मुस्लिम एकता की ऐसी मिसाल है, जिसे आज भी याद किया जाना चाहिए। दोनों क्रांतिकारियों ने देश की आजादी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और राष्ट्र के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।
प्रो. मोहम्मद नोमान ने कहा कि काकोरी कांड को केवल एक रेल घटना के रूप में देखना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। यह ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों के खिलाफ क्रांतिकारियों के सुनियोजित प्रतिरोध का प्रतीक था। उनका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि देश को विदेशी शासन से मुक्त कराना था।
उन्होंने कहा कि शहीद अशफाक उल्ला खां की मजार परिसर में इस तरह की संगोष्ठी का आयोजन विशेष महत्व रखता है। नई पीढ़ी को ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, विचारों और बलिदान से परिचित कराना आवश्यक है।
संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखकर समाज और युवा पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए। आजादी लंबे संघर्ष, त्याग और बलिदान के बाद मिली है। देश की एकता, अखंडता और आपसी भाईचारे को मजबूत बनाए रखना ही शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
कार्यक्रम के दौरान शहीद अशफाक उल्ला खां को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उपस्थित लोगों ने उनकी मजार पर पुष्प अर्पित कर देश की आजादी के लिए उनके बलिदान को याद किया। संगोष्ठी में साहित्यकारों, शिक्षाविदों, इतिहासकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बड़ी संख्या में गणमान्य लोगों ने भाग लिया।
अंत में आयोजक आलोक सक्सेना ने सभी अतिथियों और उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शाहजहांपुर हिंदी रंगमंच भविष्य में भी स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों और देश के गौरवपूर्ण इतिहास से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन करता रहेगा। इस अवसर पर अशफाक उल्ला खां, शादाब उल्ला खां, शमीम आजाद सहित अन्य लोग मौजूद रहे।